भीगी हुयी आंखों का ये मंजर न मिलेगा,
घर छोड़ के ना जाओ कही ये घर न मिलेगा
फिर याद बहुत आएगी घनी जुल्फों की शाम,
जब धूप में साया कोई सर पर न मिलेगा
आँसू को कभी ओस का कतरा न समझाना,
ऐसा कहीं चाहत का समंदर न मिलेगा
इस ख्बाब के महल में बे-ख्बाब हैं आँखें,
जब नींद बहुत आएगी तो कोई बिस्तर न मिलेगा
अनमोल सजावट है ये शर्मिल हँसी भी,
बाज़ार में ऐसा कोई जेवर न मिलेगा
ये सोच लो की अब आखिरी साया है ये मोहब्बत,
इस दर से जो उठोगे तो कोई और दर न मिलेगा ...