बुधवार, 3 जून 2009

मधुशाला

जिंदगी है, आत्मा है, ज्ञान है, मदभरा संगीत है और गान है,
सारी दुनिया के लिए ये सोमरस साकिया, तेरा अनूठा दान है

कौन कहता है की पीना पाप है, कौन कहता है की ये एक अभिशाप है,
गुन सुरा के शुष्क जन जाने कहाँ, ईश पाने का यह भी एक जाप है

क्या निराली मस्ती लाती है सुरा, हर वेदना पल में मिटाती है सुरा,
कोई भुला नही सकता इसका असर, रंग ऐसा चढाती है सुरा

क्या नज़ारे हैं छलकते प्यालों के, क्या गिनाऊ गुन तुम्हे इस हाला के,
सोते-जागते मुझे ख्बाब आते भी है तो, आते हैं बस तेरी मधुशाला के

साकिया तुझको सदा भाता रहूँ, तेरी आँखों से सुरा पाता रहूँ,
इच्छा सदा पीने की जिंदा रहे, और मयखाने तेरे मैं आता रहूँ

2 टिप्‍पणियां:

  1. स्वागत है हिंदी ब्लोगिंग में ! मधुशाला को दिल से याद किया है आपने :)

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  2. वाह वाह क्या बात है! बहुत बढ़िया लिखा है आपने! आपकी ये मधुशाला रचना पड़कर मुझे हरिवंश राय बच्चन जी की कविता याद आ गई!

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